(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Mahabharata - Drona Parva


॥ श्रीः ॥
7.195. अध्यायः 195
Mahabharata - Drona Parva - Chapter Topics
धृतराष्ट्रेण सञ्जयम्प्रति द्रोणवधश्राविणाश्वत्थाम्ना किमुक्तमिति प्रश्नः॥ 1 ॥


Mahabharata - Drona Parva - Chapter Text

धृतराष्ट्र उवाच। 7-195-0x(4779)(54161)
अधर्मेण हतं श्रुत्वा धृष्टद्युम्नेन सञ्जय।
ब्राह्मणं पितरं वृद्धमश्वत्थामा किमब्रवीत्॥ 7-195-1(54162)
मानवं वारुणाग्नेयं ब्राह्ममस्त्रं च वीर्यवान्।
ऐन्द्रं नारायणं चैव यस्मिन्नित्यं प्रतिष्ठितम्॥ 7-195-2(54163)
तमधर्मेण धर्मिष्ठं धृष्टद्युम्नेन संयुगे।
श्रुत्वा निहतमाचार्यं सोऽश्वत्थामा किमब्रवीत्॥ 7-195-3(54164)
येन रामादवाप्येह धनुर्वेदं महात्मना।
प्रोक्तान्यस्त्राणि दिव्यानि पुत्राय गुणकाङ्क्षिणा॥ 7-195-4(54165)
एकमेव हि लोकेऽस्मिन्नात्मतो गुणवत्तरम्।
इच्छन्ति पुरुषाः पुत्रं लोके नान्यं कथञ्चन॥ 7-195-5(54166)
आचार्याणां भवन्त्येव रहस्यानि महात्मनाम्।
तानि पुत्राय वा दद्युः शिष्यायानुगताय वा॥ 7-195-6(54167)
स शिष्यः प्राप्य तत्सर्वं सविशेषं च सञ्जय।
शूरः शारद्वतीपुत्रः सङ्ख्ये द्रोणादनन्तरः॥ 7-195-7(54168)
रामस्य तु समः शस्त्रे पुरन्दरसमो युधि।
कार्तवीर्यसमो वीर्ये बृहस्पतिसमो मतौ ॥ 7-195-8(54169)
महीधरसमः स्थैर्ये तेजसाऽग्निसमो युवा।
समुद्र इव गाम्भीर्ये क्रोधे चाशीविषोपमः॥ 7-195-9(54170)
स रथी प्रथमो लोके दृढधन्वा जितक्लमः।
शीघ्रोऽनिल इवाक्रन्दे चरन्क्रुद्ध इवान्तकः॥ 7-195-10(54171)
अस्यता येन सङ्ग्रामे धरण्यभिनिपीडिता।
`मेघस्तनितनिर्घोषं कम्पते भयविह्वलाः'।
यो न व्यथति सङ्ग्रमे वीरः सत्यपराक्रमः॥ 7-195-11(54172)
वेदस्नातो व्रतस्नातो धनुर्वेदे च पारगः।
महोदधिरिवाक्षोभ्यो रामो दाशरथिर्यथा॥ 7-195-12(54173)
तमधर्मेण धर्मिष्ठं धृष्टद्युम्नेन संयुगे।
श्रुत्वा निहतमाचार्यमश्वत्थामा किमब्रवीत्॥ 7-195-13(54174)
धृष्टद्युम्नस्य यो मृत्युः सृष्टस्तेन महात्मना।
यथा द्रोणस्य पाञ्चाल्यो यज्ञसेनसुतोऽभवत्॥ 7-195-14(54175)
तं नृशंसेन पापेन क्रूरेणादीर्घदर्शिना।
श्रुत्वा निहतमाचार्यमश्वत्थामा किमब्रवीत्॥ ॥ 7-195-15(54176)

इति श्रीमन्महाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि पञ्चदशदिवसयुद्धे पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ 195 ॥

Mahabharata - Drona Parva - Chapter Footnotes

5-195-4 पुत्राय गुरुकाङ्क्षिणे इति .क.झ.पाठः॥ 5-195-195 पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥


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